देहरादून..... दुसरे को आनंद देनें से आत्मा का विकास होता है, वास्तव में दुसरे को आनंद देनें से आप बड़े हो जाते हो, वास्तव में दुसरे को आनंदित देखना भी आत्मा का फैलाव है। किसी के घर में परेशानी से आप दुखी तो हो पाते हैं लेकिन बगल में किसी नें महल भी खड़ा कर दिया तो तभी भी आप दुखी हो जाते हैं जबकि महल बननें पर सुखी होना चाहिए।
उक्त विचार नवविहार कालोनी चूक्खू वाला में श्रीमद्देवी भागवत कथा के समापन दिवस पर ज्योतिष्पीठ व्यास आचार्य शिवप्रसाद ममगांई नें व्यक्त करते हुए कहा किसी की सुख प्राप्ति पर सुखी होना एक आत्मिक फैलाव है। आनंद देनें से चेतना का विस्तार होता है और जब चेतना का विस्तार होता है तो परमात्मा से चेतना लेने का आयात बढ़ जाता है जितना आयात है आपके पास उतना ही परमात्मा की कृपा की वर्षा होती है।
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आप पर ब्रह्म का आनन्द का विस्तार है उसके लिए सत्पात्र चाहिए मूर्ती हमारे भावों का स्थूलरूप है स्वामी राम कृष्ण परमहंस जी तो दुर्गा की मूर्ती को अपनी माँ का रूप मानते थे। "जाकी रही भावना जैसी प्रभू मूरत देखी नित तैसी, अतः भावो ही विध्यते देवा" के अनुसार भावना ही में देवता निवास करते हैं मूर्ती पूजा भी हमको एकाग्रता के सूत्र में बांधती है तथा सृजन पालन पोषण संहरण शक्ति उस आदि शक्ति महामाया में जिसके सहारे देवों नें अरूणा सुर जिसनें छ पग दो पग और हथियार से मृत्यु ना हो बर मांगा था ब्रह्मा जी से वहीं देवों की प्रार्थना पर छ पग वालें भौरों के रूप में अरूणासुर का बध किया।



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