मनोज नौडियाल
टेहरी। "मंजिल उन्हीं को मिलती है,
जिनके सपनों में जान होती है।
पंखों से कुछ नहीं होता,
हौसलों से उड़ान होती है।"
आप इसे अनुभव कर सकते हैं, जब आप शांति केंतुरा से मिलते हैं. शांति उस युवा ऊर्जा का प्रमाण है जो स्थापित मान्यताओं और परंपरा के नाम पे पुरानी सोच को ना सिर्फ चुनौती देती है, बल्की बिना कोई क्रांति की मशाल के खामोशी से अपने सपनो को साकार करने में रमी रहती है, व्यस्त रहती है. शांति अपनी उद्यमिता यात्रा बताते हुए कहती है.....
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है ये सूरत बदलनी चाहिए!
नाम शांति है तो इसका मतलब सब जैसा है वैसा आज्ञाकारी, सुसंस्कृत बच्चे की मानिंद स्वीकार ले ऐसी नही है शांति, उसके अंदर कुछ कर गुजारने की अदम्य शक्ति हमेशा से रही है. अब यह कुछ कर गुजारने का मतलब यही है कि नया सीखना, अपनी क्षमताओं को लगातार विकसित करना और स्वावलंबन और आत्मनिर्भर होना.
बचपन के दिन भी क्या दिन थे?
टिहरी गढ़वाल के रनी चौरी में डारगी में जन्मी शांति एक संयुक्त परिवार में बचपन और युवावस्था गुजरी. घर का माहौल ऐसा कि कभी ना लड़के, लड़की का भेद पता चला और ना ही घर परिवार के कामों की बाध्यता. जैसे सामान्य गावों में होता है, खेत, मवेशी की जवाबदारी सामान्य बात है पर बस शांति को इसकी कोई फिकर ही नही, वह तो बस पढ़ने लिखने में मगन और अपनी सहपाठियों सहेलियों के संग बस हंसते खेलते नए-नए सपने देखती. शांति एक सैनिक परिवार से आती है, पिता भारतीय सेना से निवृति के बाद अपने गांव आए. एक सौम्य प्रजितिशील पारिवारिक पृष्ठभूमि में पली बढ़ी शांति बचपन से ही कुछ अलग करना है ऐसा सोचती थी. बस स्कूल में भी वह एक जिज्ञासु छात्र रही. अपनी माता को वह अपनी प्रेरणा मानती है. हमेशा वह शांति को प्रेरित करती रहीं और उसी का परिणाम है शादी, बच्चे और जवाबदारियां बढ़ने के बावजूद उसने अपनी पढ़ाई जारी रखी और अपनी दूसरी संतान के जन्म के पश्चात भी ग्रेजुएशन पूरी करी.
शांति बताती है आज तक उसने अपनी माता को कभी गुस्सा करते या "तुम लड़की हो इसलिए.." वाली नसीहत करते नही देखा, शादी के बाद भी पढ़ाई जारी रखने और बच्चों के जन्म के बाद भी ग्रेजुएशन का हौसला और प्रेरणा हमेशा मां से मिला.
शांति यह साबित कर रही है कि प्रेरणा और साहस के साथ, व्यक्ति महान ऊँचाइयों को प्राप्त कर सकता है। शांति उसी का एक बेहतरीन उदाहरण है। अपने गाँव की महिलाओं के बीच भले अब वह एक लोकप्रिय नाम है, लेकिन उसे सशक्तिकरण के रास्ते पर कठिनाइयों और संघर्षों के अपने हिस्से का सामना करना पड़ा है।
बदलाव ही जिंदगी में स्थाई सत्य है: जीवन एक संघर्ष
सपने थे कुछ अनजाने से और जैसे गुड्डे गुड़िया का खेल .... 1999 में बारहवीं पास करते ही शांति का विवाह हो गया. विवाह के पश्चात जैसे एक नए चुनौतीपूर्ण अध्याय का अनावरण हुआ. शांति एक ऐसे
ऐसे गाँव में पहुंची, जहाँ अशिक्षित होने के अलावा, महिलाओं को अपने घर - परिवार, खेत - खलियान, पशु, बाल - बच्चे और रिश्तेदारों की सेवा सुश्रुषा में खपना ही जैसे एक सफल बहू, बीबी होने का पैमाना था। शांति खुद को भाग्यवान मानती है कि उनके पति सदैव उनका सहारा रहे। घर और खेत खलियान के कामों में अनुभवहीन शांति शुरू में जैसे एक झटका लगा पर शांति एक जुझारू महिला है और हर मानना सिखा ही नही तो सब काम सीखा और एक बहू के किरदार को सफलतापूर्वक निभाया. पर इस आपाधापी में उसने अपने सपने को हमेशा जीवित रखा और "कुछ करने" की लौ प्रजावल्लित रखी इसमें उनके पति जो दिल्ली में होटल में अपनी सेवाएं देते हैं उनका हमेशा सहयोग मिला.
शिक्षा स्वावलंबन और शशिक्तिकरण का महत्वपूर्ण घटक है
यह सब तो ठीक है पर शांति बस यूं ही जीवन नहीं व्यतीत करना चाहती थी.
वीडियो:
2001 में बड़ी बेटी का जन्म हुआ और शांति ने BA प्रथम वर्ष पूरा किया 2003 में छोटी बिटिया जन्मी और शांति ने ग्रैजुएशन पूरा किया. कितना रोचक है कि सृजन के साथ ही शांति सदैव पढ़ती ही रही, ज्ञानार्जन कि यह कैसी ललक कि गर्भावस्था के चुनौतीपूर्ण समय और प्रसवकाल में भी पढ़ने की ऐसी तमन्ना? इसपर शांति कहती हैं "खासकर दूर दराज के स्थलों, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में रहती महिलाओं के लिए शिक्षा ही एकमात्र साधन है जिससे वे दुनिया के बदलाव से परिचित हो सकती है और स्वयं ज़माने से ताल मिलाकर चल सकती है, शिक्षा से विश्लेषण, तर्क के साथ महिलाओ में अपने हक़ अधिकार की समझ भी आती हैं और यह प्रेरणा भी कि समाज में उन्नति, विकास और संपन्नता में उसका भी हिस्सा है और उसे प्राप्त करने का माध्यम एकमात्र शिक्षा है ' .
एक पत्नी, बहु, माता की भूमिका सफलतापूर्वक निभाते हुए 2005 - 2006 गांव के शिशु मंदिर में पढ़ाया, फिर 2006 से 2007 तक सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत प्राइमरी स्कूल में " रूम टू रीड 'में शिक्षा कर्म किया. 2007 में घर में देवरानी आई तो लगा अब जवाबदारी कुछ कम हुई और उसने भी साथ दियाऔर शांति रनीचौड़ में कमरा लेकर रहने लगी. घर परिवार और बच्चियों का लालन पालन करते हुए अपने सपनो को आकार देने की जिजीविषा जारी रखी. कभी सिलाई,कभी नेटवर्क मार्केटिंग शांति सबर से दुनिया और व्यापार के स्वरूप सिखती रही.
2012 से 2015 तक रोटरी नामक संस्था के कंप्यूटर प्रशिक्षण संस्थान में पढ़ाया. पर अभी भी शांति के मन को शांति नही मिली, उसकी वह "कुछ करने" की मंजिल अभी दूर थी बाकी थी. बढ़ी जवाबदारी और आर्थिक जरूरतें अब उसे कुछ करने को असहज सी करने लगी..,
मुझे कुछ अलग करना है: एक धुंधला सपना और इस कुछ को परिभाषित करने की जिद.
शांति ने नौकरी छोड़ी और सिलाई बुनाई की मशीन ली और एक नए सफर की शुरुआत हुईं.
अपने लिए जिए तो क्या जिए
शांति जैसे तैसे अपने संघर्ष में डटी रही पर उसने इतने समय में समाज में कई महिलाओं की परिस्थिति को करीब से समझा था जहां कम शिक्षा, बिना किसी प्रशिक्षण और हुनर के कई महिलाएं एक कष्टकर जीवन जी रहीं हैं, उनके घर में आमदनी के अभाव में अनेक मुश्किलें हैं और तो और महिलाएं अपने स्वस्थ की अनदेखी करने को मजबूर जीवन जी रही हैं बस उसने अपने साथ 4-5 महिलाओं को जोड़ा और मशरूम उत्पादन और अचार निर्माण के हुनर को सबको सीखना शुरू किया. शांति के साथ जुड़ी महिलाओं के कौशल में निखार आता गया, सफाई आती गई तो उसने अपने बनाए आचार को स्थानिक बाजार में उतारा जिसे लोगों ने पसंद करना शुरू किया और ऐसे शांति को सुकून मिले ऐसा काम शुरू हुआ
पहाड़ की अनकही सर्वमान्य हकीकत
" मुझे बुरा लगता है जब कोई सूर्य अस्त पहाड़ मस्त " को कटाक्ष की भांति कहता है पर विडंबना यह है कि यहां ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं, कई महिलाएं अभिशप्त हैं अपने परिवार को, उसकी जवाबदारी को ढोने को, बस मैं ऐसी बहनों को ज्यादा से ज्यादा एक स्वाभिमान भरा जीवन, स्वावलंबी जीवन बनाने में भरसक योगदान करना चाहती हूं", सच पूछो तो मुझे कई बार लगता है इन पहाड़ों को अगर किसी ने बचा रखा है तो बस यहां की महिलाओं ने..," शांति भावुक हो जाती है.
सफलता की राह खुद बनानी पड़ती है
प्रकृति में सक्रिय होने के कारण शांति ने महिला स्वयं सहायता समूह की स्थापना और शुरुआत की। अपने गाँव के महिला समूह के बीच आर्थिक बाधाओं और स्वतंत्रता की कमी की समस्याओं को महसूस करने पर, शांति ने दृढ़ता से अपना पक्ष रखा और महिला स्व-सहायता समूहों पर ब्लॉक अधिकारियों द्वारा संबोधित की जाने वाली महिलाओं के एक समूह में शामिल हो गईं, और अन्य संबंधित विभागों से जानकारी इकट्ठा करके, शांति ने इन समूहों के बारे में अपनी साथी महिला ग्रामीणों को शिक्षित करने के लिए अपनी यात्रा शुरू की।
अपने सपनों को साकार करने और जीवन में वित्तीय स्थिरता और स्वतंत्रता के महत्त्व के बारे में महिलाओं को शिक्षित करने के लिए के लिए शांति ने लगातार महीनों तक कई बैठकें कीं।
एक सफल उद्यमी की राह पर
शांति जी अब स्वयं की कोशिश की बदौलत रूरल बिज़नेस इनक्यूबेटर से प्रशिक्षित होकर पेशेवर महिला बन गई हैं, क्योंकि वह न केवल अपने समूह की महिलाओं को सिखाती और शिक्षित करती हैं, बल्कि अन्य महिलाओं को भी सिखाती है।
गढ़वाली समुल ब्रांड से आज अपने अचार को गर्व से लोकप्रिय होते देखना उन्हे अच्छा लगता है.
रुरल बिजनस इनक्यूबेटर(RBI) ने दिया प्रशिक्षण सहयोग और दिखाई उद्यमिता की राह!
2022 में उत्तराखंड साशन की महत्वाकांक्षी संभावित एवं मौजूदा उद्यमियों को समर्थन देने वाले प्रोजेेक्ट- रुरल बिजनस इनक्यूबेटर(RBI) कोहोर्ट का हिस्सा बनी , जिसने उन्हें अपने कारोबार को व्यवस्थित तरीके से विकसित करने में सक्षम बनाया।
‘‘पहले मैं दूसरों के लिए काम करती थी, लेकिन रुरल बिजनस इनक्यूबेटर(RBI) ने मेरी किस्मत बदली। इसने मुझे अलग तरीके से सोचने का साहस दिया, मुझमें आत्मविश्वास पैदा किया कि मैं भी अपना काम करके उद्यमी बन सकती हूं। प्रोगाम ने मुझे सिखाया कि मुझे अपने कारोबार की योजना कैसे बनानी है, बाज़ार पर रिसर्च कर किस तरह से इसे आगे बढ़ाना है। इसने मुझे अहसास दिलाया कि मेरा काम मेरी कल्पना से कहीं अधिक आगे बढ़ सकता है, मैं अपने काम को सीमित दायरे से भी बाहर भी ले जा सकती हूं। आज मैं एक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म ऐमज़ान और फ्लिपकार्ट पर विक्रेता के रूप में अपने उत्पाद प्रस्तुत करनें को आतुर हूं और इसका श्रेय सिर्फ रुरल बिजनस इनक्यूबेटर(RBI) टीम के सहयोग एवं मार्गदर्शन को जाता है।’’ शांति कृतिज्ञतापूर्ण स्वर में कहती हैं.
जब से रुरल बिजनस इनक्यूबेटर(RBI) से जुड़ना हुआ और इस केंद्र के विशेषज्ञों का लगातार प्रोत्साहन मिलना उत्साह वर्धक रहा रहा। मुझे दो बातों का अहसास हुआ, पहला कि कार्य कभी भी विशिष्ट या असामान्य नहीं होते। कभी-कभी सामान्य कार्य करते हुए आप बहुत विशशष्ट बन जाते हैं। दूसरा कि असफलता सफलता की सीढ़ीमात्र है। इन सीढ़ियों को एक के बाद एक पार करते ही हम सफलता प्राप्त कर सकते हैं.
शांति एक प्रेरक और प्रेरणा
कोरोना ने सभी लोगों को प्रभावित किया, रोजगार छीने ऐसे में शांति ने कर्मठता का परिचय देते हुए खुद अपना मकान बनाया और एक सफल मां, गृहणी की भी भूमिका को न्याय दिया. आज अपने गढ़वाली समूल उत्पादों को बड़े पैमाने पर फैलाने शांति राज्य के मुख्य जिलों में मार्केट और अच्छा और सस्ता सामान खरीदने को जाति हैं. शांति को इतनी भागदौड़ और परिश्रम करते देख सभी उसके मुरीद हैं और क्षेत्र की अन्य महिलाएं भी उनका अनुकरण कर उनसे जुड़कर स्वावलंबी बनाना चाह रही हैं. शांति की बच्चियों के लिए वह एक रोल मॉडल है और जितना संभव हो बच्चियां अपनी मां का साथ निभाती हैं. शांति उन्हे सदैव पढ़ने की प्रेरित करती हैं और जीवन में बड़ा सोचने को प्रेरित करती है.
गढ़वाली समुल एक सपना और सामाजिक सरोकार का उद्यम
शांति से पूछा गया कि यह गढ़वाली समुल नाम ही क्यों रखा? वे बड़ी खुशी से बताती है "मैं गढ़वाली संस्कृति, परंपरा, विरासत को मज़बूत करना और लोकप्रिय करना चाहती हूं! मैं यहां पहाड़ों में उगने वाले फलों का उपयोग करती हूं, और यह फल उगाने को बहनों को प्रेरित करती हूं, इससे दो फायदे एक अपने ग्राहकों को में रसायन मुक्त उत्पाद पेश करती हूं, दूसरे बहनों को कृषि बागवानी से आमदनी भी होती है साथ ही लगातार कृषि से जमीन उर्वरा रहती है और पर्यावरण का संवर्धन भी होता है, सो मेरा उद्यम सिर्फ व्यापार नही एक सोशल बिजनेस है और आरबीआई के सहयोग से मैं इसे बड़े स्तर तक जरूर पहचाऊंगी."
शांति का बहनों को संदेश
शांति विवेकानंद को उद्धृत करती है, ‘महिलाओं को बस शिक्षा दे दो। इसके बाद वे खुद बताएंगी उनके लिए किस तरह की सुधार जरूरत है। मामूली दिक्कतों में भी उन्हें अब तक असहाय बने रहने, दूसरों पर निर्भर रहने और आंसू बहाने का ही प्रशिक्षण दिया गया है।’लेकिन
आज हमारी बहने बिल्कुल लाचार नहीं हैं वे जागरूक हैं, कर्मठ हैं बस सही मार्गदर्शन की जरूरत है, जो RBI जैसे कार्यक्रम से बखूबी हमें दिया जा रहा है। ‘किसी भी देश की प्रगति का सबसे बेहतर पैमाना भले ही आप यह तय कर लें कि वह देश अपनी महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार करता है?
महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना चाहिए क्योंकि इससे उन्हें समाज को समझने में मदद मिलती है साथ ही समाज और व्यापार के विभिन्न प्रयासों से उनकी व्यवहार कुशलता भी बढ़ती है और वह समाज विकास में बराबर की भागीदार बनती है..!
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