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उत्तराखंड में कीवी की खेती | कीवी बागवानी तकनीक, जलवायु, किस्में और सरकारी अनुदान

 

उत्तराखंड में कीवी की खेती – किसानों के लिए लाभकारी बागवानी

उत्तराखंड में कीवी की बागवानी: किसानों के लिए लाभकारी विकल्प

✍️ डा० राजेन्द्र कुकसाल

कीवी फल का महत्व

कीवी एक स्वादिष्ट एवं पौष्टिक फल है। तुड़ाई के बाद इसके फल काफी समय तक सुरक्षित रखे जा सकते हैं। कीवी से जैम, जैली, स्क्वैश एवं जूस भी बनाया जाता है। इस फल को जंगली जानवरों से अपेक्षाकृत कम नुकसान होता है। इन्हीं विशेषताओं के कारण राज्य को “कीवी प्रदेश” बनाने की चर्चाएँ हो रही हैं और कुछ प्रगतिशील बागवानों ने इस दिशा में प्रयास भी शुरू कर दिए हैं।


कीवी उत्पादन हेतु उपयुक्त क्षेत्र

मध्यम पहाड़ी क्षेत्र (1200–2000 मीटर ऊँचाई), जहाँ ग्रीष्मकालीन तापमान 35°C से अधिक न हो, तेज हवाएँ चलती हों तथा पाला न पड़ता हो, कीवी उत्पादन के लिए उपयुक्त हैं। जो क्षेत्र सेब के लिए अधिक गर्म तथा उपोष्ण फलों (नींबू वर्ग, लोकाट, लीची) के लिए अधिक ठंडे होते हैं, वहाँ कीवी की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।

राज्य में कीवी उत्पादन की वर्तमान स्थिति

अच्छी गुणवत्ता के पौधों की कमी, तकनीकी जानकारी का अभाव तथा उचित विपणन व्यवस्था न होने के कारण राज्य में कीवी उत्पादन अभी व्यावसायिक रूप नहीं ले पाया है।

पौध सामग्री की उपलब्धता

अधिकतर प्रगतिशील कृषक अच्छी गुणवत्ता के कीवी पौधे डॉ. वाई. एस. परमार औद्यानिक एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी (सोलन, हिमाचल प्रदेश) से प्राप्त करते हैं।

कीवी फल का इतिहास

कीवी (चीनी गूजबैरी) की उत्पत्ति चीन में हुई। पिछले कुछ दशकों में यह विश्वभर में अत्यंत लोकप्रिय हुआ है। न्यूज़ीलैंड इस फल के लिए प्रसिद्ध है, क्योंकि वहाँ इसका व्यावसायिक उत्पादन और निर्यात बड़े पैमाने पर होता है।

भारत में कीवी की शुरुआत

भारत में कीवी 1960 में पहली बार बेंगलुरु में लगाया गया, लेकिन पर्याप्त शीतकालीन चिलिंग न मिलने के कारण सफलता नहीं मिली। 1963 में राष्ट्रीय पादप अनुवांशिक संसाधन व्यूरो (NBPGR), शिमला (फागली) में सात प्रजातियाँ आयात कर लगाई गईं, जहाँ सफल उत्पादन प्राप्त हुआ।

उत्तराखंड में कीवी पर प्रारंभिक प्रयोग

उत्तराखंड में 1984–85 में भारत इटली फल विकास परियोजना के अंतर्गत राजकीय उद्यान मगरा (टिहरी गढ़वाल) में कीवी की विभिन्न किस्मों के 100 पौधे लगाए गए, जो आज भी अच्छा उत्पादन दे रहे हैं।

शोध एवं विस्तार कार्य

बर्ष 1991–92 में तत्कालीन उद्यान निदेशक डा० डी.एस. राठौर द्वारा राष्ट्रीय पादप अनुवांशिक संसाधन व्यूरो (NBPGR) फागली शिमला हिमाचल प्रदेश से कीवी की सात प्रजातियों मंगा कर प्रयोग हेतु राज्य के विभिन्न उद्यान शोध केन्द्रों यथा  चौबटिया (रानीखेत), चकरौता (देहरादून), गैना/अंचोली (पिथौरागढ़), डुंडा (उत्तरकाशी) आदि स्थानों में लगाए गए, जिनसे उत्साहजनक परिणाम मिले।

NBPGR निगलाट, भवाली का योगदान

राष्ट्रीय पादप अनुवांशिक संसाधन ब्यूरो NBPGR निगलाट, भवाली (नैनीताल) में भी 1991 से कीवी उत्पादन पर शोध कार्य हो रहे हैं। यह केन्द्र सीमित संख्या में कीवी फल पौधों का उत्पादन भी करता है। इस केन्द्र के सहयोग से भवाली (नैनीताल) के आसपास के क्षेत्रों में कीवी फलों के कुछ बाग में विकसित हुए हैं।

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प्रगतिशील बागवानों के प्रयास

राज्य में कीवी बागवानी की सफलता को देखते हुए कई बागवानों ने बागवानी बोर्ड व उद्यान विभाग की सहायता से कीवी के बाग विकसित किए हैं। 

प्रथम कीवी प्रोजेक्ट

उद्यान पंडित कुन्दन सिंह पंवार ने 1998 में राष्ट्रीय बागवानी वोर्ड देहरादून की सहायता से पहला कीवी प्रोजेक्ट पाव नैनबाग जनपद टेहरी में लगाया। 

बागेश्वर में कीवी उत्पादन

नैबार्ड के सहयोग से ग्राम्या द्वारा जनपद बागेश्वर के शामा व उसके आस पास के गांवों के कृषक कीवी का अच्छा उत्पादन कर रहे हैं।

कीवी के पौष्टिक गुण

कीवी फल में विटामिन सी, विटामिन B, फास्फोरस एवं कैल्शियम प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। डैगू बुखार में इस फल को लाभकारी माना जाता है। 


जलवायु आवश्यकताएँ

किवी एक पर्णपाती ( पतझड़ ) पौधा है इसे लगभग 600 - 800 द्रूतिशीतन घण्टे ( चिलिंग ) सुषुप्तावस्था को तोड़ने के लिए चाहिए। मध्यवर्ती क्षेत्रों में 1200 से 2000 मी॰ की उँचाई तक इसे सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। कीवी में फूल अप्रैल माह में आते हैं और उस समय पाले का प्रकोप फल बनने में बाधक होता है। अतः जिन क्षेत्रों में पाले की समस्या है वहां कीवी फल की बागबानी सफलतापूर्वक नही हो पाती। वे क्षेत्र जिनका तापमान गर्मियों में 35 डिग्री से कम रहता है तथा तेज हवायें चलती हो, कीवी लगाने के लिए उपयुक्त हैं । कीवी के लिए सूखे महिनों मई-जून और सितम्बर अक्टूबर में सिंचाई का पूरा प्रबन्ध होना चाहिए।

भूमि का चुनाव एवं मृदा परीक्षण

जीवाँशयुक्त बलुई दोमट भूमि जिसमें जल निकास की उचित व्यवस्था हो सर्वोत्तम रहती है। जिस भूमि में कीवी का उद्यान लगाना है उस भूमि का मृदा परीक्षण अवश्य कराएं जिससे मृदा में जैविक कार्वन , पी .एच. मान (पावर औफ हाइड्रोजन या पोटेंशियल हाइड्रोजन ) व चयनित भूमि में उपलव्ध पोषक तत्वों की जानकारी मिल सके।

जैविक कार्बन का महत्व

अच्छी उपज हेतु मिट्टी में जैविक/जीवांश कार्वन 0.8 तक होना चाहिए। कार्बन पदार्थ कृषि के लिए बहुत लाभकारी है, क्योंकि यह भूमि को सामान्य बनाए रखता है। यह मिट्टी को ऊसर, बंजर, अम्लीय या क्षारीय होने से बचाता है। जमीन में इसकी मात्रा अधिक होने से मिट्टी की जैविक,भौतिक एवं रासायनिक ताकत बढ़ जाती है तथा इसकी संरचना भी बेहतर हो जाती है।

यदि भूमि में जैविक कार्वन की मात्रा कम हो तो जंगल की ऊपरी सतह की मिट्टी, गोबर/ कम्पोस्ट खाद व जीवामृत का प्रयोग करें। 

पीएच मान का प्रभाव

पी.एच. मान मिट्टी की अम्लीयता व क्षारीयता का एक पैमाना है यह पौधों की पोषक तत्वों की उपलब्धता को प्रभावित करता है यदि मिट्टी का पी.एच. मान कम (अम्लीय) है तो मिट्टी में चूना मिलायें यदि मिट्टी का पी.एच. मान अधिक (क्षारीय)है तो मिट्टी में कैल्सियम सल्फेट,(जिप्सम)  का प्रयोग करें। भूमि के क्षारीय व अम्लीय होने से मृदा में पाये जाने वाले लाभ दायक जीवाणुओं की क्रियाशीलता कम हो जाती है तथा हानीकारक जीवाणुओ /फंगस में बढ़ोतरी होती है साथ ही मृदा में उपस्थित सूक्ष्म व मुख्य तत्त्वों की घुलनशीलता पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है। कीवी के लिए 6.5 पीएच मान वाली भूमि उपयुक्त रहती है।


कीवी की प्रमुख किस्में

किवी फल मे नर व मादा दो प्रकार की किस्में होती है। नर - मुतवा तैमूरी एलीसन। मादा -  एलीसन,एवोट, ब्रूनों, हैवर्ड एवं मोन्टी। एलीसन में नर एवं मादा दोनों तरह के पौधे होते हैं। 

हैवर्ड न्यूजीलैण्ड की सबसे अधिक उन्नत किस्में है। एलीसन व मोन्टी जिसकी मिठास सबसे अधिक है उपयुक्त पाई गई है। एलीसन एवं हैवार्ड किस्मों का रोपण अधिक करना चाहिए इनमें गुणवत्ता युक्त अधिक उत्पादन पाया गया है। एलिसन किस्म थोड़ा गर्म क्षेत्रों 1200-1600 मीटर तक की ऊंचाई वाले स्थानों तथा हैवार्ड ठंडे इलाकों 1600-2000 मीटर तक की ऊंचाई वाले स्थानों के लिए उपयुक्त है हैवार्ड लेट किस्म है इसके फल एलीसन के एक सप्ताह बाद तैयार होते हैं।।

रेखांकन एवं पौध रोपण विधि

पौध लगाने से पहले खेत में रेखांकन करें। कीवी के पौधे 6 x 4 मीटर याने लाइन से लाइन की दूरी चार मीटर तथा लाइन में पौध से पौध की दूरी 6 मीटर रखें।

पौधे लगाने के एक माह पहले 1x1x1मीटर आकार के गड्ढे खोदकर खुला छोड़ देना चाहिए ताकि सूर्य की तेज गर्मी से कीड़े मकोड़े मर जायं।

गड्ढा खोदने समय पहले ऊपर की 6" तक की मिट्टी खोद कर अलग रख लेते हैं इस मिट्टी में जीवांश अधिक मात्रा में होता है गड्ढे भरते समय इस मिट्टी को पूरे गड्ढे की मिट्टी के साथ मिला देते हैं इसके पश्चात एक भाग अच्छी सडी गोबर की खाद या कम्पोस्ट जिसमें ट्रायकोडर्मा मिला हुआ हो  मिट्टी में मिलाकर गढ्ढों को जमीन की सतह से लगभग 20 से 25 से॰मी॰ ऊंचाई तक भर देना चाहिए ताकि पौध लगाने से पूर्व गढ्ढों की मिट्टी ठीक से बैठ कर जमीन की सतह तक आ जाये।

पौधों को शीत काल में याने दिसंबर जनवरी या बसन्त के शुरू में लगाया जाता है। पौधों को भरे हुए गड्ढौं के बीच में लगायें पौधे की चारों ओर की मिट्टी भली भांति दबायें पौध लगाने पर सिंचाई अवश्य करें।

कीवी के पौधे एक लिंगी होते हैं जिसमें मादा और नर फूल प्रथक प्रथक पौधों पर आते हैं इसलिए यह आवश्यक है कि मादा पौधों की एक निश्चित संख्या के बीच में परागण हेतु एक नर पौधा भी लगा हो इसके लिए 1:6 1:8 या 1:9 के अनुपात से पौधों को लगाना चाहिए। 

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नर ओर मादा पौधों की रोपण योजना-

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मादा पौधा -O

 नर पौधा   -X

देखभाल एवं पोषण प्रबंधन

पोषण - किवी फल के पौधों की वृद्वि और उत्पादन  उरवर्कों की सही मात्रा पर निर्भर करता है। 


सिंचाई प्रबंधन

सिंचाईः-  सूखे महिनों मई-जून और सितम्बर अक्टूबर में सिंचाई का पूरा प्रबन्ध होना चाहिए। अगर इस समय सिंचाई न हो तो पौधों की वृद्वि तथा उत्पादन पर प्रभाव पड़ता है।

सिधाई एवं काट-छांट

कीवी की लताओं को सीधा रखने की आवश्यकता होती है लताऔं को सीधा रखने का अभिप्राय पौधों को आधार व आकार प्रदान करना है। शुरू में पौधों को लकड़ी के डंडों के सहारे ऊपर चलाते हैं यदि लगायें डंडे पर लिपटती है तो उन्हें छुड़ा कर सीधा करें तथा सुतली से बांध कर ऊपर चढ़ायें। पौधों की सिधाई टी- बार ,ट्रेलिस, या परगोला विधि के अनुसार की जाती है। पहले वर्ष पौधे को लगभग भूमि से 30 से॰मी॰ की उचांई से काटा जाता है तथा बाद में एक ही शाख को ट्रेलिस पर चढ़ा दिया जाता है। इस मुख्य शाखा में से दो शाखायें निकाली जाती है जिन पर 2 फीट की दूरी पर अनेक शाखओं को तारों पर फैला देते है। इस प्रकार की विधि 4-5 साल तक करनी पड़ती है और उस के बाद पौधे फल देने लगता है। तारों पर फैले हुई शाखओं को तीसरी व छटी आंख तक काटते है और इन ही शाखओं पर जो शाखायें निकली है उन्ही पर फल लगते है। ज्यादा फल लेने के लिए पौधों की परगोला विधि द्वारा सिंघाई करनी चाहिए इससे फल धूप तथा पक्षियों द्वारा खराब नही होते।

परागण एवं फल विकास

फूल खिलने पर परागण का विशेष ध्यान रखना पड़ता है जितना अच्छा परागण होगा फल में उतने अधिक बीज बनेंगे अधिक बीज बनेंगे तो फल का आकार भी बढ़ा होगा। कीवी में परागण हवा या मधुमक्खियों द्वारा होता है, आवश्यकता होने पर मैनुअली परागण करना होता है। फूल खिलने पर क्षेत्र विशेष में रासायनिक कीटनाशक दवा का छिड़काव न करें।

फल विरलन (थिनिंग)

बाजार में बड़े आकार के फलों की मांग अधिक होती है कीवी में फलों का आकार बढ़ाने हेतु फल विरलन/ छंटाई (थिंकिंग)करना आवश्यक है इसके अतिरिक्त सही पोषण, परागण तथा जल प्रबंधन आदि का विषेश ध्यान रखना चाहिए।

हैवार्ड के अतिरिक्त कीवी फल की सभी किस्मों में अधिक फल लगते हैं। फलों की थिंकिंग परागण के कुछ समय बाद जब फल 2.5-3.5 सेंटीमीटर के हों कर देनी चाहिए एक टहनी पर 3 या 4 फल ही रखें तथा अन्य छोटे व अविकसित फलों को हटा दें।

फलों की तोड़ाई उपज व विपणन

अच्छी उपज के लिए कीवी के पौधों को 5 बर्ष का समय लगता है, व्यवसायिक उपज में 8-10 बर्ष का समय लग जाता हैं। एक लता से 50-60 किलो ग्राम फल प्राप्त किये जा सकते हैं। फलों को सही परिपक्व स्थिति पर ही तोड़ना चाहिए जो अक्टूबर-नवम्बर में आती है। परिपक्व होने पर कीवी फल के आवरण तथा गूदे के रंग में  कोई परिवर्तन नहीं आता है जिससे फल के परिपक्व होने का अनुमान आसानी से नहीं लग पाता कीवी फलौ की परिपक्वता फलौ के वाह्य आवरण के बाल रोऔं से किया जा सकता है,परिपक्व फलौं के रोयैं हाथ फेरने पर आसानी से फल से अलग हो जाते हैं।

परिपक्व ठोस रूप में पैक किये गये कीवी के फलों को कमरे के तापमान में खाने योग्य मुलायम अवस्था में आने में लगभग 20 दिनों का समय लगता है। इस अवधि में विपणन कार्य को आसानी से किया जा सकता है।

जिस समय किवी फल तैयार होता है, उन दिनो बाजार में ताजे फलों के अभाव के कारण किसान काफी आर्थिक लाभ उठा सकता है। इसे शीतगृहों मे चार महीने तक आसानी से सुरक्षित रखा जा सकता है। फलो को दूर भेजने में भी कोई हानि नही होती, क्योंकि कीवी के फल अधिक टिकाऊ है कमरे के तापमान पर इसे एक माह तक रखा जा सकता है इन्ही कारणों से बाजार में इसको लम्बे समय तक बेच कर अधिक लाभ कमाया जा सकता है। इसके विपणन के लिए गत्ते के 3 से 5 किलो के डिब्बे प्रयोग में लाने चाहिए।

विदेशी पर्यटकों में यह फल अधिक लोकप्रिय होने के कारण दिल्ली व अन्य बड़े शहरों मे इसे आसानी से अच्छे दामों पर बेचा जा सकता है।

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उत्तराखंड में कीवी उत्पादन की वर्तमान उपलब्धियाँ

उत्तराखंड में कीवी फल उत्पादन का भविष्य दिखाई देता है, जनपद बागेश्वर व कुछ अन्य स्थानों में कीवी उत्पादन के उत्साहवर्धक परिणाम सामने आ रहे हैं । बागेश्वर जनपद का शामा क्षेत्र NBPGR निगलाट भवाली नैनीताल व नैबार्ड के सहयोग से श्री भगवान सिंह कोरंगा व अन्य बागवानों के विगत कई वर्षों के प्रयास से कीवी हब के रूप में विकसित हो रहा है। इस बर्ष  (2024-25) में  इसकी बिक्री एक करोड़ से पार पहुंच गई है। अब तक 700 कुंतल कीवी निर्यात हो गया है। बागेश्वर जनपद के 200 से अधिक किसान इस कारोबार से जुड़े हैं। राज्य के अन्य जनपदों  में अधिकतर बागवान तकनीकी  जानकारी के अभाव  व स्थानीय बाजार में कीवी फलों के उचित दाम न मिल पाने तथा उचित विपणन व्यवस्था न होने के कारण आज भी कीवी फल उत्पादन को व्यवसायिक रूप नहीं दे पा रहे हैं।


कीवी मिशन योजना

राज्य सैक्टर के अन्तर्गत उद्यान विभाग ने बर्ष 2022-23 से कीवी मिशन योजना शुरू की है जिसके अन्तर्गत कृषकों को 80% अनुदान का प्रावधान रखा गया है। दस नाली  (0.20 हैक्टेयर) भूमि पर कीवी का बाग लगाने हेतु कुल खर्चा पांच लाख याने सरकार किसानों को चार लाख अस्सी हज़ार रुपए का अनुदान देगी शेष एक लाख बीस हजार रुपए कृषक अंश होगा। कीवी प्रदेश बनाने की दिशा में सरकार की सकारात्मक पहल।

निष्कर्ष

उत्तराखंड में कीवी बागवानी की अपार संभावनाएं हैं। उचित तकनीकी मार्गदर्शन गुणवत्ता पूर्ण पौध और विपणन व्यवस्था से यह किसानों की आय का मजबूत स्त्रोत बन सकती है


FAQ – उत्तराखंड में कीवी की बागवानी

Q1. उत्तराखंड में कीवी की खेती कहाँ की जा सकती है?

Ans: उत्तराखंड में 1200 से 2000 मीटर ऊँचाई वाले मध्यम पर्वतीय क्षेत्रों में कीवी की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है, जहाँ तापमान अधिक गर्म न हो और पाले की समस्या कम हो।


Q2. कीवी की खेती के लिए कौन-सी जलवायु उपयुक्त होती है?

Ans: कीवी के लिए ठंडी व समशीतोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है। इसे 600 से 800 चिलिंग घंटों की आवश्यकता होती है तथा फूल आने के समय पाले से बचाव जरूरी है।


Q3. उत्तराखंड में कीवी की प्रमुख किस्में कौन-सी हैं?

Ans: उत्तराखंड में एलिसन, हैवर्ड, ब्रूनो, एवोट और मोंटी प्रमुख मादा किस्में हैं, जबकि मुतवा और तैमूरी नर किस्में परागण के लिए लगाई जाती हैं।


Q4. कीवी का पौधा कितने वर्ष में फल देना शुरू करता है?

Ans: कीवी का पौधा लगभग 5 वर्ष में फल देना शुरू करता है, जबकि 8 से 10 वर्ष में पूर्ण व्यावसायिक उत्पादन देने लगता है।


Q5. कीवी की खेती में नर और मादा पौधों का अनुपात क्या होना चाहिए?

Ans: बेहतर परागण और उत्पादन के लिए नर और मादा पौधों का अनुपात 1:6 से 1:9 रखा जाता है।


Q6. कीवी की खेती से प्रति पौधा कितनी उपज मिलती है?

Ans: अच्छी देखभाल और अनुकूल परिस्थितियों में एक कीवी पौधे से 50 से 60 किलोग्राम तक फल उत्पादन संभव है।


Q7. कीवी फल की तुड़ाई का सही समय क्या है?

Ans: कीवी फल की तुड़ाई अक्टूबर से नवंबर माह के बीच की जाती है, जब फल पूरी तरह विकसित हो जाते हैं।


Q8. कीवी मिशन योजना क्या है?

Ans: कीवी मिशन योजना उत्तराखंड सरकार की एक विशेष योजना है, जिसके अंतर्गत कीवी बागवानी को बढ़ावा देने के लिए किसानों को 80 प्रतिशत तक अनुदान दिया जाता है।


Q9. कीवी फल को कितने समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है?

Ans: कीवी फल को सामान्य तापमान पर लगभग एक माह तथा शीतगृह में चार माह तक सुरक्षित रखा जा सकता है।


Q10. क्या कीवी की खेती पहाड़ी किसानों के लिए लाभकारी है?

Ans: हाँ, कीवी की खेती पहाड़ी किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी है क्योंकि इसमें जंगली जानवरों का नुकसान कम होता है और बाजार में इसकी अच्छी मांग रहती है।



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